(रिपोर्ट@ईश्वर शुक्ला)                                ऋषिकेश/समाचार भास्कर - रंगदारी मांगने के आरोप में अपनी नौकरी गवां कर जेल जाने वाले पत्रकार महेंद्र प्रताप सिंह के लिए कोर्ट से राहत की बड़ी खबर है। कोर्ट ने महेंद्र प्रताप सिंह पर लगाई गई चार धाराओ में से एक मुख्य धारा 386 को साक्ष्यों के अभाव में हटा दिया है। न्यायालय अपर मुख्य न्यायधीश ऋषिकेश की कोर्ट ने यह अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट के ताजा फैसले में पत्रकार महेंद्र प्रताप सिंह पर दर्ज भारतीय दंड संहिता की धारा 386 को हटाने का आदेश जारी किया है। 

आरोपी पत्रकार की ओर से अधिवक्ता शुभम राठी ने कोर्ट में जोरदार जिरह की। बहस की सुनवाई के बाद कोर्ट इस तर्क पर सहमत हुआ कि पत्रकार महेंद्र प्रताप सिंह पर धारा 386 योजित होने के लिए साक्ष्यों का अभाव है। लिहाजा उपरोक्त धारा को हटा दिया जाय। विद्वान अधिवक्ता शुभम राठी ने कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि इस मामले में ऋषिकेश कोतवाली में अभियुक्त महेंद्र प्रताप सिंह के विरुद्ध शिकायतकर्ता शम्भू पासवान की शिकायत पर 386, 384, 504, 506 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। विवेचना के बाद अभियुक्त के खिलाफ कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गई। अधिवक्ता शुभम राठी ने तर्क दिया कि भा.द.स. 386, 384 एक साथ गठन नहीं किया जा सकता। प्रथम सूचना रिपोर्ट में अभियुक्त द्वारा शहर में लोगों को भय दिखाकर धन मांगने का उल्लेख किया गया है। परंतु आवेदक को मृत्यु या जान माल की धमकी का कोई उल्लेख नहीं है। अतः धारा 386 के गठित किये जाने के लिए जिन तत्वों का मौजूद होना आवश्यक है। उनका वर्तमान मामले में अभाव है। अधिवक्ता शुभम राठी की ओर से पेश की गई तमाम दलीलों व तर्कों के आधार पर मा.कोर्ट ने अपने आदेश दिया कि धारा 386 भा. द.स. गठित होने के लिए किसी व्यक्ति को मृत्यु या घोर उपहति के भय में डालकर उद्दापन किया जाना आवश्यक है। परंतु मौजूदा मामले में वादी को मृत्यु का भय या उपहति का भय दिखाकर कोई नाज़ायज़ मांग की गई हो इसका उल्लेख नहीं है। कोर्ट ने जिक्र किया कि केस डायरी में अंकित साक्षियों के साक्ष्य में भी इस तरह का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। कोर्ट ने अंततः आदेश दिया कि पत्रावली पर उपलब्ध समस्त अभियोजन साक्ष्य से अभियुक्त के विरुद्ध धारा 386 भा. द.स. विरचित किये जाने का पर्याप्त साक्ष्य मौजूद नहीं है।

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