(रिपोर्ट @ ईश्वर शुक्ला)

ऋषिकेश/समाचार भास्कर -  एक ऐसा वर्ग जो देखने में तो अमीर जैसा लगता है परंतु वास्तव में वह गरीब जैसा ही होता है। उसके पास रहने के लिए चार दीवारी से घिरा हुआ मकान तो है पर शायद अंदर छप्पर की झोपड़ी ही होती है। कहने को उसका व्यापार होता है पर वह किस तरह चार पैसे से अपने परिवार का पालन पोषण करता है यह वही जानता है। एक अच्छा मोबाइल रखना और बाइक उसके पास होना यह उसकी मजबूरी है। मगर जमा पूंजी के नाम पर उसके पास कोई बैंक बैलेंस नहीं होता है। एक ऐसा वर्ग जो समाज के बंधनों के कारण ना किसी के आगे अपने हालातों पर रो सकता है और ना ही किसी के आगे अपने हाथ फैला सकता है। जो ना ठेला लगाकर अपनी जीवकोपार्जन कर सकता है। ना ही सरकार द्वारा चलाई जा रही अनेक योजनाओं का लाभ ले पाता है। क्योंकि श्रमिक के रूप में श्रमविभाग में रजिस्ट्रेशन नहीं होता है। इस संकट की घड़ी में यह वर्ग अपना जीवन यापन कैसे करें सोचनीय है। आज जब साधन संपन्न लोग आगे बढ़कर दिल खोलकर जरूरत मंदो की मदद कर रहा है। ऐसे में यह वर्ग उनके कल्याणकारी कार्यों की कवरेज के लिए घंटों तक कार्यक्रम में शामिल होकर अपना अमूल्य समय बर्बाद करता है। 
आज कोरोना वैश्विक महामारी के दूसरी लहर में भयंकर संकट में जहां स्वास्थ्य कर्मचारी, पुलिसकर्मी अपने कर्तव्यों का निर्वाहन इमानदारी से कर रहे हैं। वही एक मीडिया कर्मी अपनी वह अपने की जान की परवाह किए बगैर समाज को कोरोनावायरस के भयंकर परिणाम से अवगत कराते हुए समाज को बचाने का अथक प्रयास कर रहा है। यह बिना किसी किड्स पहने और खतरों से खेलते हुए कवरेज में लगा है। मगर अभी तक किसी भी समाज सेवी संस्थान संपन्न लोग एवं क्षेत्रीय विधायक व सांसद तथा मेयर, पालिका अध्यक्ष, पंचायत अध्यक्ष, ग्राम प्रधान व पार्षद ने इन अवैतनिक क्षेत्र वे स्तर पर काम कर रहे मशीनरी पत्रकारों की आर्थिक स्थिति को जानने समझने का प्रयास नहीं किया है। यह अपनी जिवकोपार्जन कैसे मेनटेन कर रहे हैं। जो इस संकट की घड़ी में अति आवश्यक है ।

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