(कार्तिक पूर्णिमा 12 नवम्बर पर विशेष )
ऋषिकेश - कार्तिक पूर्णिमा का एक अति विशिष्ट पक्ष है वह है उसका देव-दीपावली होना ,जिस प्रकार हम लोग कार्तिक अमावस्या को दीपावली के रूप में मनाते है उसी तरह देवता कार्तिक की पूर्णिमा में अपना दीपावली महोत्सव मनाते है ।
ऐसा इसलिए भी आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु चार माह के समय चातुर्मास में योगनिकालीन रहते है ।सम्पूर्ण जगत के पालनहर्ता श्रीहरि के इस शयनकाल में समाप्त मांगलिक कार्यो का स्थगित होना स्वभाविक ही है ।इसी कारण सनातन धर्म के पंचांगों में चातुर्मास में विवाह मुहूर्त नही दिए जाते है । कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन भगवान् विष्णु के योगनिद्रा से जग जाने के उपरांत ही विवाह आदि शुभ कार्य पुनः शुरू होते है । हमारी दीपावली की तिथि कार्तिक अमावस्या श्रीहरि के शयनकाल से इस पर्व में विष्णु प्रिया लक्ष्मी जी का पूजन उनके पति के बिना ही होता है ।
तंत्रशास्त्र के अनुसार कार्तिक की अमावस्या भगवती कमला की जयंती तिथि है ऐसी मान्यता हैं की समुद्र मंथन से लक्ष्मी जी इसीदिन प्रकट हुई थी । दीपावली की लक्ष्मी पूजा में दीपमालिका प्रज्वलित करते समय पढ़े जाने वाले मंत्रो में विष्णु पत्नी लक्ष्मी जी को श्रीहरि के जगने से पूर्व जगाया जाता है जिस प्रकार एक अच्छी पत्नी पति के उठाने से पूर्व जगकर घर का सारा काम संहाल लेती है उसी तरह भगवान विष्णु की अर्धाग्नि लक्ष्मी जी कार्तिक शुक्ल एकादशी में उनके जगने से पहले कार्तिक अमावस्या में जाग्रत होकर लोक पालन की व्यवस्था संभाल लेती है । कार्तिक पूर्णिमा में देवगण श्री लक्ष्मी-नारायण का पूजन करके दीपोत्सव मनाते है जो लोग भगवान सत्यनारायण की कथा तथा पूर्णिमा के व्रत का अनुष्ठान सुरु करना चाहते हो वे इसका शुभारंभ कार्तिक पूर्णिमा से करे । इससे उन्हें मनोवांछित फल प्राप्त होगा । पुराणों के अनुसार श्री नारायण की परमप्रिय तुलसी का आविर्भाव भी कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ था । इन तुलसी के श्राप से श्रीहरि शालिग्राम बन गए थे ।कार्तिक शुक्ल द्वादशी से पूर्णिमा तक तुलसी शालिग्राम का विवाहोत्सव वैष्णव संप्रदाय बड़ी श्रद्धा एवं उत्साह के साथ संपन्न करते है ।
गौड़ीय वैष्णवों के मत से कार्तिक पूर्णिमा के दिन योगेश्वर श्रीकृष्ण ने रास लीला की थी अतः वे इस तिथि को महारास पूर्णिमा कहते है तथा इस दिन रास यात्रा आयोजित करते है ।निम्बार्क सम्प्रदाय के महा भगवतो के लिए कार्तिक पूर्णिमा का सर्वाधिक महत्व है । सुदर्शन चक्र स्वरूप निम्बार्क का अवतरण इसी तिथि में हुआ था कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान करने का अतिशय माहात्म्य है ।कृतिका नक्षत्र से संयुक्त कार्तिक पूर्णिमा में गंगा जी में स्नान करने से कई गुना अधिक पूण्यफल प्राप्त होता है ,जो लोग गंगा जी में जाने में असमर्थ है वह तुलसी और आँवले का चूर्ण साफ पानी से भरी बाल्टी में डालकर नहाये । इनसे उन्हें भी गंगा स्नान का पूर्णफल मिलेगा । कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवन शंकर ने त्रिपुरासुर का संहार करके स्वर्ग सहित सब लोकों को उसके अत्याचार से मुक्त किया । त्रिपुरासुर के वध से प्रसन्न होकर देवताओं ने स्वर्ग में असंख्य दीपक जलाकर कार्तिक पूर्णिमा में दीपावली मनायी और तभी से यह तिथि कहलाने लगी देव-दीपावली ।
कार्तिक पूर्णिमा के शिव पुत्र कार्तिकेय के दर्शन पूजन से मनोभिलाषा पूर्ण होती है हमारी गणना के अनुसार इस वर्ष मंगलवार 12 नवम्बर को देव-दीपावली का पर्वकाल है और इस दिन विशेष है - स्नान दान व्रतादि की कार्तिक पूर्णिमा ,मत्स्यावतार ,मन्वादि , भृगु आश्रम (बलिया)ददरी में स्नान का विशेष महत्व है ,श्री निम्बार्क जयंती ,श्री गुरुनानक जयंती ,कार्तिकेय दर्शन ,तथा इस दी  चतुर्माष समाप्त हो जायेगा ।
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